JainologyInPracticalLife

 

जैनोलॉजी इन प्रैक्टिकल लाइफ

 


“जैनालॉजी प्रेक्टिकल लाईफ का केवल इतना सा अर्थ है कि कैसे जो जैनोलॉजी की अवधारणा है वो नियमित दैनिक दिनचर्या में कैसे प्रेक्टिकल करे। आप सामायिक कर रहे हो, माला गिनते होगे, 48 मिनट की सामायिक, 40 मिनट की
माला। क्या जीवन अपना 48 मिनट का है या 24 घंटे का है? लेकिन धर्म केवल हम 4 घंटा करते है
बाकी 23 घंटे सांसारिक है। अंधियारे में उजाले की आवश्यकता है या उजाले में उजाले की आवश्यकता
है। समस्या में समाधान की आवश्यकता है या समाधान में समाधान की आवश्यकता है? संसार में
समस्या है या समाधान है। फिर धर्म क्या की आवश्यकता कहाँ पर है? संसार में आवश्यकता है। नौका
की आवश्यकता जो किनारे पर पहुँचा उसके लिए है या जो किनारे पर पहुँचना चाहता है उसके लिए। इसी
प्रकार धर्म एक नोका है। किनारे पर पहुँचने वाले का आवश्यकता नहीं और जो किनारे पर है उसे भी
आवश्यकता नहीं। जरूरत उसे ही है जो पानी के बीच में है। 

जैन इज विनर-विनर इज जैन। जिनश्य अनुयायी न जैनस्थ। जिन उनको कहते है जो जीतते है
और जिनश्वर उन्हें कहते है जो जीतते भी है, जीतने का रास्ता भी प्रदान करते है और जीतने का संबल
भी देते है। हम उनके अनुयायी है और जिनके हम अनुयायी होते है उनकी लाईफ स्टाइल का अनुसरण
करते है। जैसे किसी बच्चे का कोई क्रिकेट खिलाडी आदर्श होगा तो वह उसकी नकल करेगा उसके जैसे
ही बेट आदि पकडने की क्रिया करेंगा। हमारी लाईफ में उसके सूत्र आ जाते है। किसी का फैन होना
इसका मतलब मैं उसकी एनर्जी को ग्रहण कर रहा हूँ। जो ग्रहण करता है वो अनुयायी बनता है। हमें
किसको ग्रहण करना है? अरिहंतो मह॒देवों जावजीव्वं—-गहियं। मैंने इनको ग्रहण किया है। जानने और
मानने की बात है ही नहीं। आपका जो शरीर बनता है वो जानने से बनता है या ग्रहण करने से बनता है?
जो गुस्सा आता है वो इसलिए आता है कि गुस्से की एनर्जी को ग्रहण किया, भय को ग्रहण किया डर गये,
अहंकार लोभ को ग्रहण किया तो अहंकारी एवं लोभी हो गए। जो हम ग्रहण करेगे वो हम बन जायेगे।”