KalyanMitra

कल्याण मित्र


क्षेत्र शुद्धि, सगाई (सूत्र संधान), विवाह (गृहस्थ धर्म दीक्षा), साद पुराई और नामकरण हमारे जीवन के महत्वपूर्ण और अविभाज्य संस्कार है। ये केवल कार्यक्रम न रहते हुवे, भगवत्ता जागरण के अनुष्ठान का अवसर भी देते है जो परिवार, समाज एवं व्यक्ति को भगवत शक्ति को ग्रहण करते हुए उसे सुरक्षित करने के लिए सहायक होते हैं। जैन शास्त्रों और आगमके अपने गहन अध्ययन से, गुरुदेव श्री ऋषि प्रवीण ने समाज उत्थान के लिए “कल्याण मित्र” के रूप में एक अलौकिक भेट दी है। कल्याण मित्र याने कल्याण कराने वाला, आनंद देने वाला मित्र।आपके घर का ख़ुशी का अवसर, कल्याण मित्र के द्वारा सकारात्मकता ऊर्जा प्राप्त करने का अवसर बन सकता है। आगम मंत्र और उच्चारों से, आगम विधियों से मंगलता एवं शुभता का स्रोत पहले की नकारात्मकता को मिटाता है। जब शुरुआत सही होती है, तो रास्ते सुहाने होते है। तो यदि आपके नए (या पुराने) वास्तु में, रिश्तों की नयी शुरुआत में – सगाई, विवाह में, शिशु के जीवन के पहले पहले संस्कार में – साद पुराई, नामकरण कल्याण मित्र के द्वारा अर्हत्त पद्धति से करा सकते हैं। इसका प्रशिक्षण 2006, पुणे से प्रारम्भ हुआ|

यह कोर्स क्यों करना है?

जब शुरुआत सही होती है, तो रास्ते सुहाने होते है। तो यदि आपके नए (या पुराने) वास्तु में, रिश्तों की नयी शुरुआत में – सगाई, विवाह में, शिशु के जीवन के पहले पहले संस्कार में – साद पुराई, नामकरण कल्याण मित्र के द्वारा अर्हत्त पद्धति से करा सकते हैं।

Contact no. – 8788376803, 9840722222

विधि

1. क्षेत्रशुद्धि – भूमि, मकान या दूकान के नकारात्मक प्रवाह को निकालना, वहां के जीवों की शक्ति को उत्कृष्ट कराना, जड -चेतन की शक्ति को बढाना और अवरोध दूर करना।
2. सगाई/ रिंग सेरेमनी – सादगीपूर्ण एक दूसरे को सहयोग समर्थन देना इस लक्ष्य के साथ वचनबद्धता और सुत्र बंधन के नियमों के साथ संस्कार कराना।
3. गृहस्थ धर्म दीक्षा (विवाह) – परमात्मा ने सिद्ध (successful) होने के 15 मार्ग बताए उनमें से एक गृहलिंग सिद्धा। उसमें से श्रावक-श्राविका इन दो तीर्थ के लिए जो साधना बतायी उसे स्वीकार करने के लिए संकल्प बध्द होना और वचन पूर्ती करना, इसके संस्कार।
4. सादपूराई – मंदिर बनी माँ की काया में विराजमान परमात्म स्वरुप उस चेतना का बहुआयामी विकास हो। मंगलकारी 14 सपनों से 2 हृदयों का मंगल संस्करण करना।
5. नामकरण – नाम हो ऐसा जो सत्य का बोध कराये, शुभ का जागरण कराये तथा जीवन जीने का मंत्र बने – ऐसा नामकरण संस्करण।

गृहस्थ जीवन को सुखमय जीना, लेकर पंचपरमेष्ठी की शरण
देव गुरु धर्म की कृपा को पाना, युगल लक्ष्य को सिद्ध बनाना।

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गृहस्थ धर्म का पहला चरण – सगाई।
ये शुरुआत दिव्यता से हो, पंचपरमेष्ठी की ऊर्जा और आशीर्वाद से हो, इसके लिए एक शुभ प्रयास।

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क्षेत्र की शुद्धि, मांगल्यता बढ़ाती, ऊर्जा को शुभ ऊर्जा में परिवर्तित करती,
क्षेत्र विशुद्धि द्वारा अपनी भूमि को मंगल बनाएं।

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आने जीव का पहला स्वागत, पहला समारम्भ,
मंगल हो जाए, धन्य हो जाए।

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नामकरण एक संस्कार है, नाम से मिलाती वह पहचान है. नाम लेते हैं जब मिलता है आशीर्वाद, उस आशीर्वाद की यह है शुरुआत।

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