AnandGatha

आनंद गाथा

एक छोटे से गाँव, देहात में जन्मा बेटा जिसने कुछ समझने के पहले ही पिता की छत खो दी, पिता का साया खो दिया। पिता का चले जाना आसमान का चला जाना होता है। माँ का चले जाना धरती का खो जाना होता है, धरती खो जाती है। माँ की जाने से संतति निराधार हो जाती है। सिर के ऊपर कुछ ना रहे तो भी मुश्किल। पाँव के नीचे कुछ भी न रहे तब भी मुश्किल। वो सौभाग्यशाली हैं जिनके सिर पर छत भी है और पाँवों के नीचे धरती भी है। जिसको समझ आने से पहले ही छत चली गयी। बुद्धि से समझ नहीं सकता था, लेकिन उसकी पीड़ा महसूस किये बगैर रह भी नहीं सकता था। इतना ही है कि जिसके पास बुद्धि होती है वह पीड़ा को शब्द दे देता है, जिसके पास बुद्धि नहीं होती है वह रोता ही रह जाता है।
कैसे एक छोटा सा बालक भगवान बन जाता है? क्या बल था उसके पास? क्या दृष्टी थी उसके पास? रत्नऋषिजी म.सा. के पास सिर्फ नेमीचंद ही नहीं पहुंचा था, बहुत से लोग पहुंचे थे और नेमीचंद के पहले और भी कई लोगों ने दीक्षा भी ली थी। रत्नऋषिजी म.सा. ने उनको भी दीक्षा दी, शिक्षा दी, प्यार दिया, उन पर भी कृपा बरसाई, लेकिन वो गुमनामी में खो गए, पता ही नहीं। एक नेमीचंद ही ऐसा कैसे बना कि उस पर कृपा बरसाई, तो वह स्वयं कृपा सागर बन गया? एक बूँद कृपा की पायी तो वह कृपा सागर बन गया। एक हाथ गुरुदेव का पाया और स्वयं का हाथ करोड़ों के दे दिया। ऐसी कौनसी दृष्टी उनके पास रही होगी, ऐसी कौनसी जीवनशैली रही होगी जिसके कारण वे शिखर पर पहुंचे? इसकी यात्रा ही है – आनंद गाथा। प्रतिवर्ष श्री आनंद जन्मोत्सव, श्री आनंद दीक्षोत्सव, श्री आनंद पुण्य स्मरणोत्सव में श्री आनंद गाथा का भावात्मक अनुष्ठान होता है। असंख्य श्रद्धाशील भक्तगणों के अंतर्मन में आनंद का गीत-संगीत गुंजित होता है। भक्तगणों की भावना-मांग-आग्रह रहा कि आनंद गाथा अक्षर रूप में हो।