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आर्ट ऑफ़ फॅमिली लाइफ

कुदुंब जागरिया – घर को मंदिर बनाने का अभियान


कुदुंब जागरिया – घर को मंदिर बनाने का अभियान
कुटुम्ब जागरिया अर्थात परिवार की जागृति। परिवार की टूटती हुई व्यवस्था मैं जीवन मूल्यों को पुन: स्थापित करने हेतू
परिवार भावना विकसित करना ।
पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में आज हर घर और हर व्यक्ति में भावनात्मक अलगाव का एहसास है । परिवार के
सदस्यों के बीच स्नेह व सौहार्य नहीं रहा । ऐसे वातावरण में मानवीय भाव, प्राणीमात्र के साथ सहानुभुति, वात्सल्य और
करूणा के सम्बन्ध की कल्पना भी नहीं की जा सकती है ।
हम प्रतिदिन समाचार पत्रों में पढ़ते है, हिंसक वारदातों की लम्बी सूची, दहेज बलि की दर्दनाक दास्तानें, धन के लिए
हत्याएँ, युवा वर्ण में बढ़ती हुईं व्यसनाधीनता। इन सब बढ़ती हई क्रूरता, पाशविकता और दानवता के रहते आज आदमी
का कितना चारित्रिक पतन हो रहा है । यह हम सभी के लिए चिंता और चिंतन का विषय है ।
व्यक्ति का जन्म एक परिवार में होता है। जिस परिवार में कलह, संघर्ष, अशांति और स्वार्थ का वातावरण होगा वहाँ
जीवन में सुख्र शांति नहीं मिलेगी । जो उसे घर में मिलेगा उसे ही वह समाज और देश में वितरित करेगा। इसलिए
परिवार को ही संस्कार केंद्र के रूप में विकसित करना होगा । क्योंकि परिवार व्यक्ति और समाज दोनों के निर्माण में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ऐसे ही बहुआयामी उद्देश्यों का अभियान है – आर्ट ऑफ़ फॅमिली लाइफ ।
जिसका ध्येय है परिवार में स्नेह – सौजन्य – सौहार्द की धाश प्रवाहित करना।
सुखी परिवार ही सुखी व्यक्ति और समाज का आधार होता है । इसलिए ‘कुटुम्ब जागरिया’ को एक व्यापक अभियान के
रूप देकर परिवार को श्रद्धानिष्ठ बनाना इस अनुष्ठान का पवित्र लक्ष्य है ।
आर्ट ऑफ़ फॅमिली लाइफ की आचार संहिता
1. पारिवारिक जन सामुहिक रूप से प्रतिदिन आर्ट ऑफ़ फॅमिली लाइफ प्रार्थना का गान करें ।
2. प्रतिदिन अपने से ज्येष्ठ व वरिष्ठ जनों को प्रणाम करें ।
3. चौबीस घंटे के अंदर ही पारस्परिक कटुताका क्षमापना द्वारा परिमार्जन करें।
4. साप्ताहिक पारिवारिक स्वाध्याय गोष्ठी का आयोजन करे ।
5. माह में एक बार धर्म आराधना स्थान पर सपरिवार धर्म साधना करे।
घर एक मंदिर केवल कहने से या केवल सोचने से नहीं बनता। उसके लिए आवश्यकता होती हैं संस्कार, सौहार्दभाव एवं
संवादपूर्ण व्यवस्था की । श्रध्दा, प्रार्थना एवं मर्यादा की । तीनो पीढ़ियों में सुसंवाद, परिवार को मंदिर बनाता है। जिस
परिवार में तीन काल की तीन पीढ़ियां बराबर चलती हैं, वह घर मंदिर बन जाता हैं। अतीत-दादा-दादी, वर्तमान-माता-
पिता और भविष्य बच्चे हैं। हर एक का काम अलग है। और उसके अनुसार ही उसे व्यवहार करना हैं । बच्चों को माता-
पिता बनने के बाद उस कार्य को अपनाना हैं जो उनके माता-पिता ने निभाया। माता-पिता को दादा-दादी के कार्य को
अपनाना हैं।
सबसे महत्वपूर्ण होता हैं दादा-दादी का कार्य। जैसा घर (मंदिर) उनको चाहिए, वैसा ही उनको बनना है। सबसे बड़ा
आदर्श वे होते हैं, जो अनुभवी होते हैं। उनकी गलती से, भूल से भी पूरा परिवार हिल सकता हैं और यदि उनकी भूलों ने
उन्होंने सुधार लिया तो तूफानों में भी परिवार अड़िग रह सकता हैं। चक्रवर्ती का चरित्र, उन्हें तो अपनाना हैं ही, साथ
ही उनके बाद आती हुई हर पीढ़ी को अपनाने की ताकत व संस्कार भी देने हैं। घर में ऐसी व्यवस्था बनाएं कि घर का
कोई सदस्य यदि गलत रास्ते पर भी चलना चाहे तो भी चल न पाए। जो चल गया हैं, उसे घर ले आना, सहारा देना,
धक्का नहीं। गाली देने का, बगावत करने का मन हो तो भी न गाली दे पाए और न ही बगावत कर पाए ।

घर की व्यवस्था ही ऐसी हो कि पाप का चरित्र ही न बन पाए। बीमारी होने ही न पाए। परिवार को साथ में बैठकर
संविधान बनाना, जांच-पड़ताल करनी चाहिए । माता-पिता को राजा बनकर रहना हैं। राजा कभी शिकायत नहीं
करता, याचक नहीं होता, मजबूर नहीं होता, गुलाम नहीं होता, वह सबका भाग्य विधाता होता हैं। उसे सबको देना ही
देना होता हैं । उसकी तरफ सब देख सकते हैं, उसे किसी की तरफ नहीं देखना हैं । माता-पिता के हाथ में ही होता हैं बच्चों
का सही चरित्र देना। उन्हीं के आचरण को देखकर बच्चे अपने आपको ढालेंगे।
व्यक्तिवाद का साम्राज्य, उपभोक्तावादी संस्कृति, टीवी, आधुनिक शिक्षा, जीवन का आर्थिकीकरण, इन सबका घातक
परिणाम हुआ है। परिवार पर, कुटुंब व्यवस्था पर। जिस कुटुंब व्यवस्था ने मानवीय मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने
का कार्य सदियों पूर्व तक बखूबी निभाया। मनुष्य के चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज से 50 साल पहले
शादी दो परिवारों का रिश्ता होती थी। लड़का-लड़की देखकर- परखकर नहीं अपितु परिवार को देख-परखकर शादियाँ
होती थी। पारिवारिक आधार पर बने हुए रिश्ते भाते भी थे और निभते भी थे । आज व्यक्तिगत स्तर पर बनते-बिगड़ते
रिश्तों ने न केवल परिवार को ध्वस्त (बरबाद) किया, बल्कि व्यक्ति स्वयं भी अशांत-अस्वस्थ-रूग्ण एवं संतप्त-परेशान
हुआ हैं ।
परिवार ही मानवीय जीवन का सर्वोत्तम सौभाग्य हैं । परिवार एक ऐसा वरदान हैं, जो केवल मनुष्य जीवन में ही हैं । न
देव गति में, न तिर्यन्व में, न नरकगति में । परिवार की सुरक्षा-समृद्धि-शांति में ही व्यक्ति एवं समाज की सुरक्षा, समृद्धि
एवं प्रगति है। समस्या परिवार की हैं तो समाधान व्यक्ति दे नहीं सकता। समस्या समाज की हैं तो समाधान परिवार दे
नहीं सकता । वैसे ही परिवार में अशांति फैलाने के लिए एक ही व्यक्ति बहुत है। पर एक व्यक्ति के करने से कुछ नहीं
होता, परिवार प्रयास करेगा तो ही पूरे परिवार में शांति आएगी। परिवार का भला परिवार का एक एक सदस्य कर
नहीं सकता, सबका साथ जरूरी होता है। परिवार बिगड़ने के लिए एक कारण हो सकता हैं, परंतु सुधारने के लिएसबका
सहयोग आवश्यक है। जैसे घर के किसी सदस्य को डांटना टॉयलेट के समान होना चाहिए, जो सबके सामने नहीं होता ।
परिवार में एक अनुशासन होना चाहिए, नहीं तो अराजकता फैल जाएगी । परमात्मा अनुशासन की शिक्षा देते हैं। वे
कहते हैं कि इसका अनुसरण करो, सब बदल जाएगा। अनुशासन है तो किसी की भी ऊर्जा व्यर्थ नहीं जाएगी। घर के
प्रत्येक सदस्य में अनुशासन हैं तो घर उद्देश्यविहीन, व्यवस्थाविहीन और दृष्टिविहीन होने से बच जाएगा । इन सब बातों
के लिए प्रायोगिक सूत्र उपाध्यायप्रवर पू. श्री. प्रवोणकषिजी म.सा. वरदान के रूप में दे रहे हैं ।
आर्ट ऑफ़ फॅमिली लाइफ अभियान द्वारा उसकी आचारसंहिता हैं । परिवार भावना के संवर्च्धन, संपोषण, संरक्षण हेतु
1. परिवार भावना का परिवार में सामूहिक गान करे
2. बड़े-ज्येष्ठ को भावपूर्ण प्रणाम
3. ज्येष्ठ द्वारा छोटों के सिर पर वरदहस्त
4. आपस के किसी वाद को लेकर संवाद (बोलचाल) बंद न हो
5. साप्ताहिक संगोष्ठी
6. मासिक ध्यान आराधना का विधान ।
आज सैंकडों परिवार सालों से आर्ट ऑफ़ फॅमिली लाइफ आचार संहिता के पालन द्वारा पारिवारिक जीवन का आनंद ले
रहे हैं।
इन सत्रों की संगोष्ठी दो घंटे की होती हैं एवं सुखी-समृद्ध-संतुष्ट परिवार का इससे निर्माण होता हैं।
आधुनिक मनोरंजन-शिक्षा-व्यवसाय-सोच एवं उपभोक्ततावादी संस्कृति / व्यवस्था का दुष्परिणाम हुआ है, पारिवारिक
जीवन-शैली / व्यवस्था पर। परिवार एवं रिश्ते टूट रहे हैं, ऐसा नहीं अपितु परिवार एवं रिश्ते संघर्ष भूमि बन गए हैं।
परिवार संस्था का विघटन-बिख्रराव के कारण व्यक्ति-आदमी का जीवन रूग्ण-विकृत-विक्षिप्त-असामाजिक होता जा
रहा हैं।
टूटते रिश्ते, बिख्ररता इंसान, रूणण विकृत बनता। आदमी का सोच, नित नए अपराधों की श्रृंखला। आत्मीय- अपनों से
होते प्रहार-अत्याचार-बलात्कार की घटनाओं से निबटने के लिए सरकार ने मजबूरन घरेलू हिंसा को अपराध / कानूनी

जुर्म जुर्म के दायरे में लाया । घरेलू हिंसा का शिकार बनने वालों को कानूनी सुरक्षा एवं शिकारी को दण्ड व्यवस्था का
विधान किया। इसके बावजूद घरेलू हिंसा आज दिन-ब-दिन बढ़ती, महंगाई के समान बढ़ती ही जा रही है।
कानूनी व्यवस्था से पारिवारिक परिवेश में होने वाले अपराधों को रोकना क्या संभव होगा? जहां आर्थिक-सामाजिक
आदि क्षेत्रोंमें होने वाले अपराधों को रोकने में कानूनी-व्यवस्था सफल नज़र नहीं आ रही, वहां पारिवारिक अपराधों
को रोकने में कामयाब हो पाएगी, यह सोचना रेगिस्तान में पानी की खोज के समान है।
पारिवारिक परिवेश में होने वाले अपराधों का मूल कारण है – कुटुंब संस्था की संरचना का टूटना। बीमारी के कारक
तत्वों का इलाज करने से ही बीमारी ठीक होगी। अतः मानवीय जीवन में घटित होने वाली दुर्घटनाओं की रोकथाम
तभी संभव है, जब स्वस्थ-समृद्ध-सशक्त कुटुंब संस्था की संरचना होगी।
इसी पावन उद्देश्य की पूर्ति के लिए अर्हम विज्जा का गरिमापूर्ण उपक्रम है – आर्ट ऑफ़ फॅमिली लाइफ – आओ घर को
मंदिर बनाएं।
घर मंदिर ठोर मंदिर है।
घर मंदिर बिना हर ठोर खँडहर है।
घर तीर्थ-सब-तीर्थ-घर तीर्थ बिना सब व्यर्थ है।
घर को मंदिर बनाना आज आवश्यक ही नहीं, अपितु मानवीय मूल्यों की सुरक्षा-संवर्धन के लिए अनिवार्य है।
परिवार ही वह संस्था-कार्यशाला है जहां उदात्त श्रद्धा एवं चरित्र की शिक्षा संस्कार संपन्न व्यक्ति का निर्माण / जन्म
होता है। व्यक्ति ज्ञान मात्र से श्रेष्ठ नहीं होता। उसको श्रेष्ठ बनाने वाले घटक हैं – श्रद्धा एवं चरित्र। यह उसे प्राप्त होते
हैं – पारिवारिक परिवेश एवं व्यवस्था से। इन दो महत्वपूर्ण जीवन अमृत स्त्रोत का उत्स उदगम अंतर्चेतना में है। पर
उसका उद्धार करने वाली शिक्षा, संस्कार व जीवन शैली परिवार से प्राप्त होती है। पांडव-पांडव बने, उसका कारण
माँ कुंती के परवरिश है। परिवार से मिली शिक्षा-संस्कार-सोच-श्रद्धा व्यक्ति के जीवन में उसके अनजाने में ही घुल-
मिल समरस होकर उसके व्यक्तित्व का निर्माण करती है।
परिवार केवल व्यक्ति के समूह से नहीं होता। न ही व्यक्ति-व्यक्ति मिलकर परिवार बनता है। परिवार का निर्माण
पारस्परिक आत्मीय सम्बन्ध-अनुबंध एवं वैशिष्टपूर्ण दायित्व एवं अधिकारों के सहज संपन्नता से बनता है। परिवार में
प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व एकमुख्री-एकआयामी न होकर बहुमुखी-बहुआयामी होता है। परिवार के अलावा अन्य
सामाजिक-आर्थिक-राजकीय संघटनाओं से प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व प्राय: एकमुख्री होता हैं। जैसे शिक्षण संस्थान में
शिक्षक का दायित्व एवं अधिकारी-विद्यार्थी के दायित्व एवं अधिकार एवं अन्य संबंधित व्यक्तियों के दायित्व के
अधिकार मर्यादित एवं एक आयामी है। जबकि परिवार में एक नारी संतति की माँ, सास-ससुर की बहू, पति की पत्नी,
ननद एवं देवर की भाभी, भतीजों की चाची, भानजों की मामी, पोतों की दादी, नातिनों की नानी ऐसी बहुविध रिश्तों
के दायित्व एवं अधिकारों के संबंधों में संपन्न होती हैं। उसे केवल कोई एक भूमिका नहीं, अपितु अलूग-अलग रिश्तों के
अलग-अलग भूमिकाओं के अखंडित-अभंग रहकर के निर्वाह करना होता है। इसी कारण परिवार में व्यक्ति के सर्वागीण
व्यक्तित्व का निर्माण सहज होता हैं।
पारिवारिक मूल्यों का ह्रास एवं रूग्णता नें व्यक्ति के अहं केन्द्रिता को न केवल पोषण दिया अपितु विकृत भी बनाया।
आज एक नारी अपनी स्वयं की लालसा-वासना-मान्यता एवं स्वार्थ-पूर्ति के लिए-अपने गर्भ में पल रहे संतति को जन्म
देने की बजाय उसको गर्भाशय जो जीवनदायी स्थली हैं उसीको मृत्युस्थली बना देती हैं । पति-पत्नी अपने व्यक्तिगत अहं
के टकराव के कारण तलाक की ख्राई में अपनी संतान को धकेल देते हैं। व्यक्ति स्वार्थान्धता के कारण आत्मविनाश के
मार्ग को आत्मविकास मार्ग बनाकर चल रहा है। गलती का अहसास तब होता हैं – जब सुधार संशोधन के सब मार्ग
अवरुद्ध हो जाते हैं।
मनुष्य-हताश-अवसाद, उन्माद, उत्तेजना, अनियंत्रित, आवेग एवं इनसे जन्मीं शारीरिक बीमारियों के चक्रव्यूह में उलझ
गया। इस राह पर मानव जाति का भविष्य न केवल अन्धकारमय अपितु भयावह है। वर्तमान की त्रासदी एवं भविष्य के

भयावह दुष्परिणामों से मानव जाति को बचाने में मंदिर-मस्जिद आदि पूजास्थल कामयाब न हुए – न ही होने की
संभावना है। मानव जाति समाज को इस आत्मघाती विभिषिका से बचाने का एक ही मार्ग हैं – परिवार सुसंस्कारों से
स्वस्थ-समृद्ध हो ।
पारिवारिक रिश्तों का आनंद कैंसे दें और कैंसे लें ? रिश्ते गहरे एवं सुखदायी हों। रिश्तों में श्रद्धा का अमृत कैंसे घोलें?
संशय-अविश्वास से रिश्तों को कैंसे सुरक्षित रखें? मनुष्य अपने जीवन में श्रेष्ठतम उपलब्धि को केसे प्राप्त करे?
इनका प्रशिक्षण परिवार को देने के लिए एक अनूठा उपक्रम है आर्ट ऑफ़ फॅमिली लाइफ शिविर का आयोजन प. पू.
ऋषि प्रवीण जी के मार्गदर्शन-निर्देशन में हो रहा है। जिसमें पारिवारिक सदस्यों की स्वतंत्र एवं संयुक्त कार्यशालाओं का
आयोजन होगा।
ऐसी बदली हुई परिस्थिति में आर्ट ऑफ़ फॅमिली लाइफ कार्यशाला का नियोजन दो वर्ष से चातुर्मास के दौरान होता है।
जिसमें सहभागी परिवार के सदस्यों की पांच या सात बैठक होती हैं।